शनिवार, 14 अगस्त 2010

ज़ख्म

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अब
भी
पा लेता
हूँ
कुछ
तो
लज्जत
उनमें,

वक्त-
बेवक्त
जख्मों
को
खुजा
लेता
हूँ.....

2 Response to ज़ख्म

20 अगस्त 2010 को 12:13 am

ये जो
"अब
भी
पा लेता
हूँ.." यहीं तो प्राब्लम है..भाई...! यहीं तो है..!
और खुजाना तो घाव ही बढ़ता है..ना...!

वैसे कलम तो खूब माकूल चली...!

archu tripathi
12 अक्तूबर 2011 को 9:13 am

"Mehkhane Me Jaam Tut Jata Hai,
Ishq Me Dil Tut Jata Hai.
Na Jane Kya Rishta Hai In Dono Me,
Jaam Tute To Ishq Yaad Aata Hai,
Dil Tute To Jaam Yaad Aata Hai…."
khair ye ek udahran hai..waise jindagi ke kuch pal yadgar hote hai..kuch aache ...kuch bure...