शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दूध, दाग और प्यार...

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जिंदगी के चूल्हे पर

तुम्हारे साथ की तपिश से

प्यार का दूध अभी उफना ही था

कि

तुमने हाथ झटक चूल्हा ही बुझा दिया

और रख दिया तर्क का ढक्कन

कि ...

नहीं तो सारा दूध उफन जाता ;

सच कहना

आखिर किसका तुम्हे डर था ?

मेरे प्यार के उफान का ,

तुम्हारे हाथ के जल जाने का,

दाग लग जाने का.

6 Response to दूध, दाग और प्यार...

13 अगस्त 2010 को 8:45 am

kavita acchi haen

13 अगस्त 2010 को 9:53 am

kisi aur patili mae kuch aur he pak raha tha k pratik ne shama band diya hai ... badhai ho sundar rachna hai,,,,

13 अगस्त 2010 को 10:25 pm

रचना जी और राहुल भाई आप दोनों को शुक्रिया ....ऐसे ही बर्दास्त करते रहिये

20 अगस्त 2010 को 12:18 am

"किसी और पतीली में कुछ और ही.."

कई बार ये सच होता है..कई बार ये हो रहा होता है..और लगभग हर बार ये भीतर कहीं घट रहा होता है..!

20 अगस्त 2010 को 9:53 am

क्या आप इसको फाके बुक पर शेयर करने का butten बना सकते हैं?

21 अगस्त 2010 को 2:41 am

ओह! बातों बातों मे क्या बात कह दी ... बहुत अच्छी रचना मै इसे बुकमार्क करता हूँ ... बधाई