शनिवार, 14 अगस्त 2010

जिंदगी और मोम ...

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जिंदगी के सारे सपनों का मोम ,
सारे रिश्ते की जमावट
तो कब की पिघल चुकी थी ।
बस रह गया था तुम्हारे साथ का इक धागा
जो जलाए रखा था जीवन की लौ
लो
आज वो भी बुझ गया
कुछ अवशेष सा जम गया मेज पर
जिसे वक्त खुरच-खुरच के साफ़ कर डालेगा ।
फिर ...???

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दूध, दाग और प्यार...

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जिंदगी के चूल्हे पर

तुम्हारे साथ की तपिश से

प्यार का दूध अभी उफना ही था

कि

तुमने हाथ झटक चूल्हा ही बुझा दिया

और रख दिया तर्क का ढक्कन

कि ...

नहीं तो सारा दूध उफन जाता ;

सच कहना

आखिर किसका तुम्हे डर था ?

मेरे प्यार के उफान का ,

तुम्हारे हाथ के जल जाने का,

दाग लग जाने का.

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

इक तुम्ही हो...

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इक तुम्ही हो जिसने सहेजा है मुझे ...
वरना बिखरने में देर कितनी लगती है ??? ...

बुधवार, 25 नवंबर 2009

साहिल पे सुन रहा था समन्दर की धडकनें ..

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इक सीख दे गयीं साहिल पे आ के लहरें ;

एक हद के बाद वापस लौट आना चाहिए।


साहिल पे सुन रहा था समंदर की धडकनें ;

लहरों को देख आवारगी का रोग लग गया.

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

बहुत लाज़िम है कि............

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बहुत लाज़िम है कि ....
तुम बुलंदी कि मीनारें हर रोज फतह कर लो ।
बहुत लाजिम है कि ......
तुम्हारी आवाज़ का जादू जमीं से आसमां तलक़ गूंजे ।
बहुत लाज़िम है कि .....
तुम्हारी नज्मों से हर दिल की धड़कनें बढ़ जाएँ ।
बहुत लाज़िम है कि....
तुम्हारे साए को छूने को हर ज़वां आशिक़ तरस जाए ।
बहुत लाज़िम है कि ....
मुल्क़ के हर कमरे की दीवारों पर तेरी तस्वीर लग जाए .
..................
ज़ब इतना हो चुका हो या की फिर हो रहा हो तो ....
पलट कर देख लेना भीड़ की उस आखिर आखों को ..
ज़रा सा गौर कर सुन लेना उसकी तेज़ साँसों को ॥
बहुत लाज़िम है कि...
तब इतने से ही वो तसल्ली से मर पाए..
बहुत लाज़िम है कि...
उसकी बेचैन रूह ख़ामोश हो जाए .....

शनिवार, 15 अगस्त 2009

ये कहा आ गएँ हैं हम ; यूँ ही साथ-साथ चलते ......

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बड़ी दिलकश लगती है ये लाइन ...हम साथ -साथ गुनगुनाने भी लगते हैं ज़रा गुनगुनाने की बजाय आज इस पर गौर करें ...आख़िर एक और मौका मिला है ;जब देशभक्ति की उमंगे हिलोरें ले रही हैं साथ- साथ चलते हम अलग-अलग नही चलने लगे हैं? अभी कुछ ही दिनों पहले देश की राजधानी के उस इलाके का वाकया है, जहाँ देश के सबसे शिक्षित और आगे देश का प्रशासन सँभालने जा रहे युवाओं का हुजूम रहता है बात शुरू हुयी दिल्ली के 'स्थानीय निवासी "(जब की दिल्ली में सब बाहर से ही आयें हैं ...) एक सरदार जी और "बाहर " (सुविधा के लिए बिहार पढ़ लें ) से आए एक युवा से मोबाइल की कोई बात लेकर सरदार जी की ही मोबाइल शॉप पे दोनों (लोकल और बाहरी ) में कुछ कहा सुनी हो गई सरदार जी जन्मजात तकिया कलाम 'तेरी भैन की...' से शुरू हुए और "बाहरी " जी के सर फोड़ने तक रुके नही इधर "बाहरी " जी के जन्म से अर्जित नेतृत्व के गुण के कारण उनके समर्थक भी जुट गए फ़िर क्या ..... नारा ; धरना ; भाषण भाषण में बात इस हद तक पहुच गई कि कई दिनों कि भड़ास भी निकल गई वक्ता ने कहा कि ; "हम यहीं यू पी - बिहार के होके बाहरी और बिहारी हो गए और ये ...... पाकिस्तान से के हिन्दुस्तानी हो गए " इस तरह एक जोशीले भाषण की समाप्ति पुलिस के लाठिओं से हुयी....
काश कोई "चिंका " भी रहा होता जी हाँ ...अभी तक यू पी और दिल्ली की बात थी अब ज़रा देश के पूर्वोत्तर भाग में चलें पूर्वोत्तर से आए लड़के -लड़कियां यहाँ "चिंका -चिंकी " के नाम से जाने जाते हैं उन्हें भी अक्सर "बाहरी" ही समझा जाता है ............तो कहिये अभी जब की "मराठी मानुष और बिहारी भईया " के बीच का दंगल ख़त्म हुए कुछ ही दिन हुए और जिसकी एक झलक "कमीने " फ़िल्म में देख सकते हैं तो क्यों गायें देश की आजादी की इस साल गिरह पे ....."ये कहाँ गए हम.............????????????"
मोबाइल की बात पे मार-पीट से एक "आईडिया आया सर जी " ...जहाँ तक मेरी जानकारी है कि आप के मोबाइल पे कल कोई ऐसा एस एम् एस नहीं आया होगा जिसमें लिखा रहा हो कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पे एस एम् एस करने पे कोई प्लान काम नही करेगा और सामान्य दर ही लागू होगा पता है उनको भी कि वैलेंटाइन डे ,फ्रेंडशिप डे, हैप्पी न्यू इयर ....वगैरा तो है नही तो कोई कितना एस एम् एस करेगा ? अरे बहुत होगा तो वही तीन लाईनों वाला पिक्चर मैसेज जो तिरंगा होने का गुमां करता है वही फॉरवर्ड किया जाएगा...
बहुत हुयी खिचाई....अब नही....जाते -जाते बस एक बात ........अब हमें बलिदान देने कि ज़रूरत नही क्योंकि जो बलिदान कर गए वो लोग और थे ....अब बस योगदान करने कि जरूरत है ....जो आज़ादी मिली है उसे सहेजने -सँभालने कि ज़रूरत है..... नहीं तो देश भारत और पाकिस्तान के हुक्मरानों कि तरह हम भी अफ़सोस के सिवा कुछ नया नहीं करने जा रहे .............
"यार हम दोनों को ये दुश्मनी महंगी पड़ी,
रोटियों का खर्च बन्दूक पे होने लगा "

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

तुम्हारे बाद जिंदगी ......

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मिल गयी थी इसमें एक बूँद तेरे इश्क की ;
इसलिए उमर भर की कड़वाहट पी ली मैनें..................